शनिवार, 30 अगस्त 2008
देश की विडंबना
हमारे देश का दुर्भाग्य है की हम कहीं से भी देश के बारे में नहीं सोचते हैं। देश क्या समाज भी आज हमसे उपेक्षित है। सबसे पहले हमारा स्वार्थ सामने आता है, फ़िर कुछ यदि शेष रहता है तो हम उसे देशभक्ति की संज्ञा दे देते हैं । हमारे कथनी और करनी में बहुत बड़ा अन्तराल आ गया है। आदर्श सूचक शब्द दूसरे के लिए हैं और हम अपेक्षा करते हैं कि दूसरे उसे अपनाएं लेकिन अपने लिए सिर्फ़ वही शब्द अपेक्षित हैं जो हमारे स्वार्थ को संबल दे सकें। हम अपने इसी बलबूते पर देश को विकाशशील से विकसित की ओर ले जाना चाहतें हैं । निकम्मापन भी देश की पुरानी बीमारी है। हम सोये से रहते हैं। न तो विवेकानंद के सामान कोई प्रेणादायक ओजस्वी नेता है और न ही हमारी आत्मा हमें झकझोरती है। इन सब बीमारियों का ही नतीजा है हम विश्व के भ्रष्टतम नागरिक में गिने जाते हैं। घोटाला, आर्थिक अपराध जैसे शब्द हमें नहीं चौकातें हैं। इन्ही सब कारणों से हमारी सवेंदना चुक सी गयी हैं। कोई भी घटना चाहे वो प्राकृतिक आपदा हो या कोई दुखद पहलू, हम तबतक निरपेक्ष रहतें हैं जबतक वह आपबीती न हो। नेता तो हमारे सदियों से प्रणम्य देवता रहे हैं। वे हमारे सभी तंत्रों को प्रजातंत्र के नाम पर धीरे-धीरे चाट रहे हैं। इन्ही सब कारणों से जन्म होता है अतिवादी विचारधारा, और हम उनकी भर्त्सना करने से नही चूकते। आज जो स्थिति है उस से हम कहीं भी पहुंचते हुए नहीं दीखते। लेकिन तब भी हम खुश हैं। यही हमारा और देश का दुर्भाग्य है।
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